'सत्यमेव जयति नानृतम्'

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Mahashivraatri महाशिवरात्रि

आज हरिद्वार में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। विभिन्न राज्यों से, दूर दूर से लोग गंगा जी में स्नान करने आ रहें हैं।डुबकी लगा रहे हैं। चारों तरफ आस्था का सैलाब उमड़ा हुआ है। श्रद्धालु उल्लसित हैं।
उधर गंगा किनारे मातृ सदन में एक सन्यासी अन्न और जल का त्याग करके तपस्यारत है।
मालूम है इस बारे में? वह क्यो अन्न जल छोड़कर तपस्या कर रहे हैं? वे क्या चाहते है’? आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसके कारण उन्हें सब त्याग करना पड़ रहा है।
तो कृपया जान लें …
जिस गंगा किनारे महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है, वही गंगा अपने उद्गम स्थल से ले कर मैदानों तक बांध रूपी जंजीरों में जकड़ी हुई है और फिर खनित हो रही है। बड़ी बड़ी मशीनों द्वारा कुचली जा रही है।
पहाड़ों पर बाँध बना कर गंगा जी को सुरंगों में कैद किया गया जिसके कारण उनका प्राकृतिक रूप बिगड़ गया। और जब गंगा मैदानी क्षेत्रों में आई तो खनन करके उनको नष्ट किया जा रहा है।
आने वाले भविष्य में महाकुम्भ  होना मुश्किल है। जब गंगा विलुप्त हो जाएगी तो कैसा कुम्भ।
ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद की तपस्या आम जनता, शासन, प्रशासन और सरकार को चेताने के लिए है।
विडंबना यह कि सरकार की समझ में आ भी गया और बांध कैंसिल किये जाने के आदेश भी हो गए। खनन बन्दी भी आदेशित की गई।
किन्तु माफिया के दबाव में सारे सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ा दी गयी।
हाल ही में ऋषि गंगा पर विष्णुगाड पीपलकोटी बांध आपदा ले आया। सैंकड़ो लोग मौत के मुंह में चले गए।
कुम्भ क्षेत्र में जहाँ खनन प्रतिबंधित था, फिर से खनन शुरू करवा दिया गया।
सन्यासी के तप की उपेक्षा और अवहेलना कर गंगा जी का अपमान किया जा रहा है।
अनेक लोगों ने अपने जीवन को दांव पर लगाया। स्वामी निगमानंद और स्वामी सानंद जी ने तो जीवन का बलिदान ही कर दिया।
श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है।
इसका बहुत भयानक परिणाम होगा।
गंगाभक्ति  आस्था आंतरिक होते हैं, बहिर्गत नही।
जितने बहिर्गत होंगे आंतरिक अशांति कम नही होगी अपितु बढ़ेगी।